मुम्बई, 26 फरवरी (युआईटीवी/आईएएनएस)| महाराष्ट्र की महा विकास अघाड़ी (एमवीए) सरकार मार्च की शुरूआत में जब अपने तीसरे वार्षिक बजट (2022-2023) के लिए तैयार है तब राज्य की वित्तीय स्थिति एक बार केंद्र में आ गयी है।
कोरोना वायरस से सर्वाधिक प्रभावित रहने के कारण पहले से जूझ रहे इस राज्य को लॉकडाउन के कारण भी कई नुकसान उठाने पड़े। कोरोना महामारी और लॉकडाउन दोनों ने राज्य की अर्थव्यवस्था, राजस्व और व्यय पर कहर बरपाया है। महामारी के प्रसार को रोकने और उससे निपटने के लिये अधिकांश संसाधनों को स्वास्थ्य क्षेत्र में इस्तेमाल किया गया।
गत वित्त वर्ष (2020-2021) तक, राज्य पर 5,20,717 करोड़ रुपये का भारी कर्ज था, जिसमें ज्यादातर भुगतान नहीं किये गये ऋण और अन्य देनदारियां शामिल थीं।
हालांकि, जीएसडीपी यानी सकल राज्य घरेलू उत्पाद की तुलना में राजकोषीय घाटा 2.1 प्रतिशत है और जीएसडीपी के लिये ऋण स्टॉक 19.6 प्रतिशत है, जो पिछले वर्ष की वित्तीय नीतिगत रणनीति के अनुसार 25 प्रतिशत की निर्धारित सीमा के भीतर है।
जाने-माने आर्थिक विशेषज्ञ और महाराष्ट्र राज्य योजना बोर्ड के पूर्व कार्यकारी अध्यक्ष डॉ रत्नाकर महाजन ने कहा, हालांकि, ऋण का आंकड़ा बड़े पैमाने पर दिखाई दे रहा है लेकिन यह पिछले कई वर्षों में विभिन्न कारकों के कारण जमा हुये ऋण का जोड़ हैं। ऋण में औसत वार्षिक वृद्धि 65,000 करोड़ रुपये के अंदर है।
कई अन्य राज्यों के विपरीत, महाराष्ट्र में बड़े स्तर पर धन का इस्तेमाल करने वाली ‘लोकलुभावन योजनायें’ नहीं चल रही हैं। जनवरी 2020 में शुरू की गयी एक महत्वपूर्ण कल्याणकारी योजना ‘शिव भोजन थाली’, जो किफायती भोजन उपलब्ध कराती है, एक अपवाद है। इस योजना को कोरोना महामारी के कारण मार्च 2020 में लगाये गये लॉकडाउन के बाद विस्तृत करके इसमें भारी सब्सिडी दी गयी थी।
मुख्यमंत्री उद्धव ठाकरे द्वारा शुरू योजना, ‘शिव भोजन थाली’, जिस पर राज्य सरकार ने पिछले 24 महीनों में 500 करोड़ रुपये से भी कम खर्च किये हैं, शहरी-ग्रामीण क्षेत्रों में गरीबों और लॉकडाउन के शुरूआती दिनों में अपने घरों को लौट रहे लाखों लोगों के लिये जीवन रक्षक साबित हुआ है।
उप मुख्यमंत्री अजीत पवार की अध्यक्षता वाले राज्य के वित्त मंत्रालय के एक अधिकारी ने कहा कि कर्ज को हर साल बिना किसी चूक के चुकाना पड़ता है। यह वार्षिक बजट का व्यय हिस्सा होता है लेकिन इसमें विवेकपूर्ण होने की गुंजाइश है।
उक्त अधिकारी ने नाम न छापने की शर्त पर यह बताया कि कैसे गंभीर कोरोना महामारी के दो साल ने अर्थव्यवस्था के सभी क्षेत्रों को प्रभावित किया है। आर्थिक मंदी, रोजगार की कमी ने अर्थव्यवस्था को और भी नुकसान पहुंचाया है। हालांकि, इनमें धीरे-धीरे सुधार हो रहा है। कृषि ऋण माफी, प्राकृतिक आपदाओं से निपटने और सभी प्रकार के कर राजस्व में कमी के अलावा केंद्र से लंबित जीएसटी बकाया की भारी राशि भी अर्थव्यवस्था के लिये बोझिल साबित हुई है।
डॉ. महाजन ने कहा कि बढ़ते राजकोषीय बोझ के लिये जिम्मेदार कारकों में से एक है छोटी अवधि के लिये उच्च ब्याज दरों पर पूंजी को जुटाना, जैसे तीन साल के लिये 11 प्रतिशतकी दर से ऋण लेना।
कुछ सरकारों ने पुराने ऋणों को लंबी अवधि के लिये कम ब्याज दरों पर ऋण पुनर्गठन करके इसे दूर करने में कामयाबी हासिल की है। इसके लिये पांच साल के लिये 8 या 9 प्रतिशत पर ऋण का पुनर्गठन किया गया, जिससे ऋण बोझ को कम करने के साथ ही बिना किसी दिक्कत के कई वर्षों में चुकाने का समय लिया गया।
इसके अलावा, जब भी कोई सरकार नयी या बड़ी परियोजनाओं को हाथ में लेती है, तो यह अगली सरकार की जिम्मेदारी बन जाती है कि वह पर्याप्त बजटीय प्रावधानों के साथ इसे आगे बढ़ाये।
अधिकारियों ने कहा कि ट्रैफिक की भीड़ को कम करने के लिये मेट्रो रेल जैसी कुछ सर्वोच्च प्राथमिकता हो सकती है, लेकिन बुलेट ट्रेन जैसी परियोजना को महामारी के समय अन्य महत्वपूर्ण क्षेत्रों के दुर्लभ संसाधनों का इस्तेमाल करने से रोका जा सकता है।
फिर भी डॉ. महाजन को लगता है कि ‘सुरक्षित और सतर्क निर्णयों’ से राज्य के वित्त को केवल दो वर्षों में अच्छी तरह से पटरी पर लाना बहुत संभव है।
उन्होंने कहा, यह पूर्व मुख्यमंत्री सुशील कुमार शिंदे के कार्यकाल के दौरान किया गया था। उनके कुछ फैसलों से वित्तीय स्थिति को मजबूत करने में मदद मिली और राज्य के कर्ज का बोझ भी काफी कम हो गया था।
अगले साल के राज्य बजट (2022-2023) के लिये, सभी की निगाहें अजीत पवार पर यह देखने के लिये टिकी हैं कि कैसे वह बढ़े खर्च और कम संसाधनों के बीच अर्थव्यवस्था को पटरी पर लाते हैं।